सेवा दल की पूर्व प्रदेश प्रवक्ता ने बोला हमला, कहा-गढ़वाल- कुमाऊँ पुराण! बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जाएगी!
राज्य बनने के बाद 23 सालों में केवल 6 महीने के लिए एक बार गढ़वाली गोदियाल पार्टी अध्यक्ष और प्रीतम सिंह नेता प्रतिपक्ष क्या रहे कि कु-पढ़े वक्ताओं के पेट में मरोड़ पड़ गए – लगे ज्ञान झाड़ने । जब महाज्ञानी देवी ने मुद्दा उठा ही दिया है तो आइना उन्हें भी दिखा देते हैं कि, इस पार्टी में गढ़वाल और गढ़वाली बोलने वालों को आखिर मिला क्या ?
अरे राज्य बनने के बाद लगातार 14 साल प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊँ से बने लगातार 2 बार हरीश रावत और 2 बार लगातार यशपाल आर्य । ये साल सत्ता , सुविधा और स्थिरता के थे । तब सारे बड़े नेता पार्टी में थे। 1 साल से आजकल अध्यक्ष कुमाऊं का माहरा है । याने 23 में से 15 साल कुछ महीने अध्यक्ष पद कुमाऊं के रहे।
गढ़वाल के नेता केवल 7 साल 6 महीने अध्यक्ष रहे 3 साल किशोर , 4 साल प्रीतम और 6 महीने गोदियाल। तीनों का समय भी कठिनाई का था। किसी को सुखी- शांत से रहने नही दिया। फ्री हैंड की तो कोई बात ही नही थी। गोदियाल ने 6 महीने में ही अपनी छाप छोड़ी पर उस गरीब गढ़वाली ब्राह्मण को किस दोष के लिए हटाया आज भी कोई नही जानता है। इनके समय सब निर्णय पूछ कर होते थे । आज की तरह अकेले के नहीं। सभी विधायकों और नेताओं को पूछा जाता था।
अब मुख्यमंत्री पर आ जाओ। आज तक कांग्रेस ने किसी गढ़वाली को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। गढ़वाली सरनेम वाले बहुगुणा भी सितारगंज के विधायक थे इसलिए उन्होंने कभी गढ़वाल की ओर देखा भी नहीं।
जरा नेता प्रतिपक्ष भी देख लो । यंहा भी आजतक की गणना में कुमांऊँ को आगे ही माना जायेगा। हरक सिंह 5 साल इंदिरा जी 4 साल 6 महीने , प्रीतम सिंह 6 महीने और यशपाल आर्य 1 साल से और आगे 4 साल पूरा करेंगे। गिनती आप कर लो।
उपनेता प्रतिपक्ष पद तो ऐसा लगता है कि कुमाऊं के लिए ही आरक्षित है। कांग्रेस ने किसी गढ़वाली को विधानसभा अध्यक्ष नहीं बनाया। 5 साल यशपाल आर्य और 5 साल कुंजवाल विधानसभा अध्यक्ष रहे।
ये पहला मौका नही है जब अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और उप नेता प्रतिपक्ष तीनों पद कुमांऊ में हैं।
सत्ता की मलाई के साल 2002-2007 के बीच मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष , विधानसभा अध्यक्ष तीनों पद कुमाऊँ को। ताकतवर मंत्री इंदिरा जी भी वंही से। सत्ता के दूसरे कार्यकाल 2012-17 के बीच भी मुख्यमंत्री बहुगुणा या रावत, प्रदेश अध्यक्ष अधिकांश समय के लिये आर्य और विधानसभा अध्यक्ष कुंजवाल थे । जब भी प्रसाद के पद की बारी आई याने राज्य सभा भेजने की बारी आई तब कुमाऊनी गए। केवल 1 साल मनोरमा शर्मा रही उनका संबंध कंहा से था ये आप ही तय कीजियेगा।
पिछली बार( 2017-2022 ) भी नेता प्रतिपक्ष इंदिरा जी और उपनेता प्रतिपक्ष करन कुमाऊं से थे। एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य – कुमाऊं में जिनको भी आज तक महत्वपूर्ण पद मिले वो भले ही तराई या हरिद्वार से चुने गए हों परंतु सभी कुमाऊनी भाषा को बोलने वाले कुमाऊनी मूल हैं ।
आंकड़े आपके सामने हैं । देख लो सच तो ये है कि , गढ़वाल जिसमें पौड़ी और टिहरी गढ़वाल का भू-भाग आता है जो गढ़वाली बोलते हैं उनको आजतक क्या मिला है ?
गढ़वाल त्याग और बलिदान के लिए था है और रहेगा। वर्तमान में भी संघटन का प्रयोग गढ़वाल के नेताओं को खत्म करने के लिए प्रयोग की भूमि बना दिया है। मुख्यालय में कोई भी गढ़वाली महत्वपूर्ण पद पर हो तो बताएं। यंहा केवल देहरादून में रहने वालों को पद दिए जाते हैं जिनका गढ़वाल से कोई मतलब नहीं।
अरे कु-पढ़ो ! बात को यंही खत्म करो , नहीं तो रोज सीरीज में लिखूंगी कि, कब -किसने क्या निर्णय लिया ? और किसको आगे बढ़ाया ? किसको खत्म किया ? गढ़वाल के नेताओं को कैसे खत्म किया।